वो जो मेरी मुट्ठी में मेरी जान लिए बैठी है
ग़ज़ल
वो जो मुट्ठी में मेरी जान लिए बैठी है
वो किसी और का अरमान लिए बैठी है
जो मेरे दर्द का सामान लिए बैठी है
वो भी क्या सीने में तूफ़ान लिए बैठी है
वरना महताब सा होता नहीं चेहरा उसका
वो मेरी आन मेरी शान लिए बैठी है
नाम सुनते ही मेरा चौंक सी जाती है जो
मेरी धड़कन मेरी पहचान लिए बैठी है
मेरी कोई भी ग़ज़ल मेरी नहीं अब यारो
इक परी रू मेरा दीवान लिए बैठी है
वो जो मासूम सी लगती है सभी को रुख़ से
हर किसी शख़्स का ईमान लिए बैठी है
यूँ मुहब्बत का नहीं होता कोई पैमाना
वो मगर हाथ में मीज़ान लिए बैठी है
आप कहते हो जिसे प्यार की मूरत वो तो
मेरी नींदें मेरी मुस्कान लिए बैठी है
अब मुहब्बत में मुझे होश कहाँ है 'मीरा'
एक लड़की मेरे औसान लिए बैठी है
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मनजीत शर्मा 'मीरा'
चंडीगढ़।
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