ग़ज़ल
ग़ज़ल ज़िंदगी कितनी दस्तूरी यहाँ पर मांग लो दिल से मंजूरी यहाँ पर फिसल जाएगा वक्त हाथों से ढलती है शाम सिन्दूरी यहाँ पर अक्श दिखता है हर शै में तुम्हारा याद महकी है कस्तूरी यहाँ पर राह कैसे मिले हैं दूर मंजिल कैसी कैसी है मजबूरी यहाँ पर हौसलों नें भरी ऊंची उड़ाने बनाया आसमाँ दूरी यहाँ पर 'शमा'ये सोचती है हो पाये यूँ शब-ए-हिज्र बेनूरी यहाँ पर। @सविता 'शमा'