ग़ज़ल

ग़ज़ल

ज़िंदगी कितनी  दस्तूरी  यहाँ  पर
मांग लो दिल से   मंजूरी  यहाँ  पर

फिसल जाएगा  वक्त हाथों से 
ढलती है  शाम  सिन्दूरी  यहाँ  पर

अक्श दिखता है हर शै में तुम्हारा 
याद महकी है  कस्तूरी  यहाँ  पर 

राह कैसे मिले हैं दूर मंजिल 
कैसी कैसी है मजबूरी  यहाँ  पर

हौसलों नें  भरी  ऊंची  उड़ाने
बनाया आसमाँ  दूरी यहाँ  पर

 'शमा'ये सोचती है हो पाये
यूँ  शब-ए-हिज्र   बेनूरी   यहाँ  पर।

                @सविता 'शमा'

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी