ग़ज़ल निरूपमा त्रिवेदी इन्दौर
ये दर्द ए आबशार छुपाकर भी खुश हैं हम
बेशक कहीं गुबार छुपाकर भी खुश हैं हम
तकदीर जहां लेके मुझे आई है वहीं
होती है जो पुकार छुपाकर भी खुश हैं हम
रिश्तों की कशिश दर्द को तनहा बना दिया
हर दर्द बेशुमार छुपाकर भी खुश हैं हम
आबो हवा को और तसल्ली से देख लूं
अब खुद को बार बार छुपाकर भी खुश हैं हम
उनके खयाल में तो ये दुनियां ख़राब है
हालात ए नागवार छुपाकर भी खुश हैं हम
गुजरी है ज़िन्दगी जो मेरी दस्त ए खौफ में
ये दिल भी है लाचार छुपाकर भी खुश हैं हम
उनके करम पे खार न खाओ निरूपमा
इस तिश्नगी की धार छुपाकर भी खुश हैं हम
निरूपमा त्रिवेदी इन्दौर
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