ग़ज़ल

चारों तरफ विवाद करें तो क्या करें
है नफरत की आग करें तो क्या करें

सबकी अपनी अपनी डफली बजती  है
अपना अपना राग करें तो क्या करें

समझाएं भी किसको कोई कम भी नहीं
झट होता नाराज़ करें तो क्या करें

राजनीति का चक्कर बहुत निराला है
मुल्क हुआ बर्बाद करें तो क्या करें

आरोपों से कौन यहां पर वंचित है
सब में है कुछ दाग करें तो क्या करें

कोई लाखों और करोड़ों में कोई
रोटी को मोहताज करें तो क्या करें।

फिर भी भारत सारी दुनिया से अच्छा
इस पर हम को नाज करें तो क्या करें

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी