ग़ज़ल

मुस्कराने की भी तरकीब बताओ यारों
कोइ हंसती हुई तस्वीर दिखाओ यारों

लोग उलझे हैं यहां अपनी ताजपोशी में
आओ जल्दी से ये दरबार सजाओ यारों

ऐसा कातिल है जिसे देख नहीं पायेगें
उसके ही नाम पर व्यापार चलाओ यारों

क्यों सरेआम मरे लोग दिखाते हो तुम
जो हैं जिंदा उन्हें दो वक्त खिलाओ यारों

सरजमी अपनी है बदनामी भी अपनी होगी
वक्त की मार है दुश्वार दिखाओ यारों

तेज आंधी है ये छप्पर उड़ा भी सकती है
एक होकर के ज़रा रब को पुकारो यारों

सब को पहचानना तो काम बड़ा मुश्किल है
जिन को पहचानो उन्हें और पहचानो यारों

आलोक रंजन इंदौरवी
इन्दौर मप्र

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी