ग़ज़ल

तेरी मेरी जो आशनाई है
ये तो उस रब ने ही बनाई है

मेरे दिल में कसक सी उठती है
ऐसी लिख दी जो ये रुबाई है

दर्द ठहरा है दिल के कोने में
जबसे वो दास्तां सुनाई है

अब न जायज़ है मशवरा उनका
अब न इसकी कोई दवाई है

इश्क़ तन्हाहाइयों से हैं मेरा
मैंने ऐसी लगन लगाई है

उसका चेहरा उदास रहता है
जाने कैसी कसम ये खाई है

उसके जैसा नहीं कोई रंजन
सारी दुनियां भी आजमाई है

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी