ग़ज़ल
तेरी मेरी जो आशनाई है
ये तो उस रब ने ही बनाई है
मेरे दिल में कसक सी उठती है
ऐसी लिख दी जो ये रुबाई है
दर्द ठहरा है दिल के कोने में
जबसे वो दास्तां सुनाई है
अब न जायज़ है मशवरा उनका
अब न इसकी कोई दवाई है
इश्क़ तन्हाहाइयों से हैं मेरा
मैंने ऐसी लगन लगाई है
उसका चेहरा उदास रहता है
जाने कैसी कसम ये खाई है
उसके जैसा नहीं कोई रंजन
सारी दुनियां भी आजमाई है
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