ग़ज़ल अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं

अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं
मगर कुछ लोग हैं ऐसे हैं जो केवल तन दिखाते हैं

जहां में लोग हैं ऐसे गरीबी पर जो हंसते हैं
मगर कुछ लोग हैं ऐसे जो अपनापन दिखाते हैं

बहू और बेटियां पहुंची हैं देखो आसमानों पर
यहां कुछ लोग तो उनके लिए बंधन दिखाते हैं

सियासत जब गलत रास्ते को ही अंजाम देती है
तो सच्चे लोग मिलकर के यहां अनशन दिखाते हैं

बने हैं संगठन कितने रसीदी कागजों पर ही
मगर जब काम आए तो सभी अनबन दिखाते हैं

नवाबी पहनकर कुर्ता बड़े जो ठाठ से रहते
चमेली देखकर स्टेज पर थिरकन दिखाते हैं

पुराने घर का वह माहौल कितना प्यारा प्यारा था
हम अपने गांव जाकर बस वही आंगन दिखाते हैं

आलोक रंजन इंदौरवी

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