ग़ज़ल अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं

अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं
मगर कुछ लोग हैं ऐसे हैं जो केवल तन दिखाते हैं

जहां में लोग हैं ऐसे गरीबी पर जो हंसते हैं
मगर कुछ लोग हैं ऐसे जो अपनापन दिखाते हैं

बहू और बेटियां पहुंची हैं देखो आसमानों पर
यहां कुछ लोग तो उनके लिए बंधन दिखाते हैं

सियासत जब गलत रास्ते को ही अंजाम देती है
तो सच्चे लोग मिलकर के यहां अनशन दिखाते हैं

बने हैं संगठन कितने रसीदी कागजों पर ही
मगर जब काम आए तो सभी अनबन दिखाते हैं

नवाबी पहनकर कुर्ता बड़े जो ठाठ से रहते
चमेली देखकर स्टेज पर थिरकन दिखाते हैं

पुराने घर का वह माहौल कितना प्यारा प्यारा था
हम अपने गांव जाकर बस वही आंगन दिखाते हैं

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी