गीत मैं अपनी पहचान बनूंगी

बाधाएं कितनी आ जाएं कदम नहीं डिगने दूंगी
सनातन और प्रेम को कभी नहीं झुकने दूंगी
सत्य सनातन संस्कृति अपनी मैं इसका सम्मान करूंगी 
मैं अपनी पहचान बनूंगी

भारत माता के चरणों में नित नित शीश झुकाऊं में
देश प्रेम की अलग जगह कर इस पर बलि बलि जाऊं मैं
भारत की संप्रभुता का विस्तृत में अभी अभियान बनूंगी
मैं अपनी पहचान बनूंगी

अपने आदर्शों का सम्यक पालन करती जाऊंगी
सद्विचार दृढ़ संकल्प ओं से आगे बढ़ती जाऊंगी
अपने बलबूते के बल पर भारत की में शान बनूंगी मैं अपनी पहचान बनूंगी

निरूपमा त्रिवेदी इन्दौर मप्र

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी