अवचेतन मन की अभिव्यक्ति
अवचेतन
ये बात अब इस दौर की भी है...
यहां स्वयं का स्वयं के साथ खडा़ होना बहुत जरुरी है
तुम वही दिल हो न?
जिसने विरानगी में भी शोर को सुना है और शोर में भी खामोशी को सुना है,
हाँ तुम वही मन हो जिसने खुद को अनसुना किया था आज तक
और आज तुम जब इसको सुन रहे हो,यकीनन सबकी नज़रों से बहुत दूर हो...
तो जी लो अब इसको भी
और देखो कौन पुकारता है मुढ़कर तुम्हें?
इस गहरे मन के सन्नाटों में देगी सुनाई एक आवाज़ और
जब वो सुनाई दे तुम्हें
तब तुम ध्यान से
गौर फरमा लेना उस पर
हो सके तो भरोसा करके चल देना
अकेले ही उस राह पर।।
दिव्या सक्सेना
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