जब से तन्हाइयों के घर आया

जबसे तन्हाइयों के घर आया
तेरा चेहरा नहीं नज़र आया

अब कहीं क्या उड़ान भरना है
आसमां से तो मैं उतर आया

रात पूनम की रोशनी देखो 
झील में तैरता क़मर आया

अश्क़ से आंख मेरी हर आई
जब भी उनका कोई जिकर आया

तेरे घर का कोई जवाब नहीं
जब भी आया तो बेफिकर आया

तुम जहां सोचते हो जानें को
मैं वहां से कभी गुज़र आया

ख़ाक छानी है सारी दुनियां की
यूं न मुझको नया हुनर आया

आलोक रंजन इंदौरवी
इन्दौर मप्र

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी