जब से तन्हाइयों के घर आया
जबसे तन्हाइयों के घर आया
तेरा चेहरा नहीं नज़र आया
अब कहीं क्या उड़ान भरना है
आसमां से तो मैं उतर आया
रात पूनम की रोशनी देखो
झील में तैरता क़मर आया
अश्क़ से आंख मेरी हर आई
जब भी उनका कोई जिकर आया
तेरे घर का कोई जवाब नहीं
जब भी आया तो बेफिकर आया
तुम जहां सोचते हो जानें को
मैं वहां से कभी गुज़र आया
ख़ाक छानी है सारी दुनियां की
यूं न मुझको नया हुनर आया
आलोक रंजन इंदौरवी
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