कविता

तुम्हारी चौखट पे कैसे आऊं तुम्हारे घर का पता नही है।
तुम्हारे क़दमों में सर झुकाऊं तुम्हारे दर का पता नही है।

भटक न जाऊं मैं तेरी शरण से।
छुङा दो पीछा जनम - मरण से।
तुम्हारे मंदिर में कैसे आऊं मुझे नगर का पता नही है।।

मीरा के जैसा मैं बिष पान कर लूं।
कान्हा की बंशी का रसपान कर लूं।
तुम्हारी भक्ति में कैसे पाऊं मुझे ज़हर का पता नही है।।

अगम अगाध अनादि अनन्ता।
सुमिर -सुमिर पद गावहि संता। 
तुम्हारी महिमा मैं कैसे गाऊं मुझे बहर का पता नही है।

चितचोर गिरधर हौ बंशी बजइया।
माखन चुरइया हौ यसोदा के छइया।
तुम्हारी मुरली की धुन बजाऊं मुझे पहर का पता नही है।

बरसाने वारी पै बलि-बलि जाऊं।
कृष्ण कन्हाई कौ कैसे रिझाऊं।
तुम्हारी आंखो में देख पाऊं मुझे नज़र का पता नही है।  
 पुष्प लता राठौर
फरीदाबाद हरियाणा


टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बहुत सुंदर

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