कविता छंद
. 7 जगण अंत यगण
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त्रिभंग कदम्ब त्रिभंग शरीर
सपीत पटा सरसीरुह रंगी।
विभूषित माल मनोहर अंग
अनंग लजावन मोहन अंगी।
खड़ा वन वेणु धरे अधरा पर
गूँज अरण्य गया रस रंगी।
विलोकन बांक सु बांक शरीर
हरे मन पीर विलोक त्रिभंगी।।
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