ग़ज़ल बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा
बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा
बेबसी के गांव में मैं किस तरह रहता रहा
भागता कैसे मैं रिश्तो के बड़े बाजार से
मैं घुटन महसूस करता और वो हंसता रहा
मुद्दतें गुजरी रवानी वक्त की बदली नहीं
फैसला कुछ कर न पाया आजकल करता रहा
कोई अपनों में नहीं था जो मुझे कुछ दाद दे
ख्वाब का रंगीं महल यूं रात दिन ढहता रहा
कितनी जंजीर है तो मैंने तोड़ कर दिखला दिया
कुछ मगर ऐसी थी जिनमें उम्र भर फंसता रहा
कौन सी वो सै है जिसमें जिंदगी हंसती रहे
उसी को देखने को हर जगह रुकता रहा
आईना बतला न पाया मेरी खामोशी का राज़
मैं उसी के सामने ही रास्ता चलता रहा
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