ग़ज़ल बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा

बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा
बेबसी के गांव में मैं किस तरह रहता रहा

भागता कैसे मैं रिश्तो के बड़े बाजार से
मैं घुटन महसूस करता और वो हंसता रहा

मुद्दतें गुजरी रवानी वक्त की बदली नहीं
फैसला कुछ कर न पाया आजकल करता रहा

कोई अपनों में नहीं था जो मुझे कुछ दाद दे
ख्वाब का रंगीं महल यूं रात दिन ढहता रहा

कितनी जंजीर है तो मैंने तोड़ कर दिखला दिया
कुछ मगर ऐसी थी जिनमें उम्र भर फंसता रहा

कौन सी वो सै है जिसमें जिंदगी हंसती रहे
उसी को देखने को हर जगह रुकता रहा

आईना बतला न पाया मेरी खामोशी का राज़
मैं उसी के सामने ही रास्ता चलता रहा

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी