कविता
खास आपके लिए....
"तनख्वाह"
तनख्वाह या कहूँ
ढेरों सपनें।
सही तो है,
तनख्वाह का दूसरा नाम
सपने ही तो हैं।
घर का राशन,दूध का बिल
बच्चे की फीस,परिवार की दवा,
सब,सब तो पूरा करती है
एक तुम्हारी तनख्वाह।
ऑफिस में,
दिन भर की मेहनत,
दिमाग का ढेरों खर्च ,
और ठंडा खाना।
आसान है क्या एक तारीख
और अच्छी लगती तनख्वाह।
बच्चे की जेब खर्ची,नए जूते,
नए कपड़े और,
और
खूबसूरत पौशाकों में तुम्हें
सुंदर लगती मैं।
सब तुम्हारी मेहनत से ही तो है।
रसोई में राशन से भरे डिब्बे
घर को अपना बनाने की किश्तें।
हर तीस तारीख़ को
फिर से नए सपने,नई खुशी
नई जिम्मेदारी,नई उम्मीद
सब सम्भालती है वो
प्यार से लाई तुम्हारी तनख्वाह।
मेरा अन्नपूर्णा कहलाना
सिर्फ तुम्हारी ही बदौलत है।
भरी पूरी रसोई ही तो बनाती है
एक स्त्री को अन्नपूर्णा।
एक अलग सा प्यार,
अलग सा पूर्ण एहसास होता है
तुम्हारे सिर्फ इतना कहने से
"लो घर खर्च"
और मुझे
पूर्ण और धनवान करते है ,
तुम्हारे कहे ये मीठे से शब्द
"सब तुम्हारा ही तो है"
"मैं" और ये "तनख्वाह"
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