कविता

खास आपके लिए....

"तनख्वाह"

तनख्वाह या कहूँ
ढेरों सपनें।
सही तो है,
तनख्वाह का दूसरा नाम
 सपने ही तो हैं।
घर का राशन,दूध का बिल
बच्चे की फीस,परिवार की दवा,
सब,सब तो पूरा करती है 
एक तुम्हारी तनख्वाह।
ऑफिस में,
दिन भर की मेहनत,
दिमाग का ढेरों खर्च ,
और ठंडा खाना।
आसान है क्या एक तारीख
और अच्छी लगती तनख्वाह।
बच्चे की जेब खर्ची,नए जूते,
नए कपड़े और,
और
 खूबसूरत पौशाकों में तुम्हें
सुंदर लगती मैं।
सब तुम्हारी मेहनत से ही तो है।
रसोई में राशन से भरे डिब्बे
घर को अपना बनाने की किश्तें।
हर तीस तारीख़ को
 फिर से नए सपने,नई खुशी
नई जिम्मेदारी,नई उम्मीद
सब सम्भालती है वो
प्यार से लाई तुम्हारी तनख्वाह।
मेरा अन्नपूर्णा कहलाना 
सिर्फ तुम्हारी ही बदौलत है।
भरी पूरी रसोई ही तो बनाती है 
एक स्त्री को अन्नपूर्णा।
एक अलग सा प्यार,
अलग सा पूर्ण एहसास होता है
तुम्हारे सिर्फ इतना कहने से
"लो घर खर्च"
और मुझे
पूर्ण और धनवान करते है ,
तुम्हारे कहे ये मीठे से शब्द
"सब तुम्हारा ही तो है"
"मैं" और ये "तनख्वाह"

माधुरी"मुस्कान"शर्मा

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी