ग़ज़ल हो गया आजकल ख़ुद से बेज़ार हूं।

ग़ज़ल 

हो गया आजकल ख़ुद से बेज़ार हूँ
ऐसा लगता है कोई गुनहगार हूँ

तुझको पाना तो मुमकिन नहीं है मगर
तेरी चाहत में अब भी गिरफ्तार हूँ

पूछते हैं सभी मुझसे सब की ख़बर
दौरे हाज़िर का लगता है अख़बार हूँ

फ़ासले रख के मुझसे मिला कीजिए
चलती फिरती मोहब्बत की तलवार हूँ

तू ज़मीं-ए-हक़ीक़त पे मिल तो सही
दीद का तेरी कब से तलब गार हूँ

अपनी तन्हाइयों का हूँ लेता मज़ा
वो समझने लगे हैं कि बीमार हूँ

अपने लब से सरस गुनगुना ले मुझे
अनकहा बज़्म का तेरी अश्आर हूँ

------सुशील तिवारी 'सरस'

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी