ग़ज़ल जिंदगी कितनी है दस्तूरी यहां पर

ग़ज़ल

ज़िंदगी कितनी  है  दस्तूरी  यहाँ  पर
मांग लो  जीने  की  मंजूरी  यहाँ  पर

फिसला जाए  वक्त हाथों से कि जैसे 
ढलती कोई  शाम  सिन्दूरी  यहाँ  पर

सारी शय में अक्श दिखता है तुम्हारा 
यादें महकी बन के कस्तूरी  यहाँ  पर 

राह मिलती राहों से मंजिल नहीं  पर
जाने कैसी कैसी  मजबूरी  यहाँ  पर

हौसलों  ने   जब  भरी  ऊंची  उड़ानें
तो  बनाया  आसमाँ  दूरी यहाँ   पर

कब 'शमा' मैं सोची थी बनके है रहना
यूँ  शब-ए-हिज्राँ  में  बेनूरी   यहाँ  पर।

                @सविता 'शमा'
ग्रेटर नोएडा

टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बेहतरीन

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