ग़ज़ल

रिश्तों को ढोते रहना बेमानी है
प्यार बिना तो हर रिश्ता बेमानी है

जो नन्हे पौधे हैं उन की फ़िक्र करो
ठूंठों को पानी देना बेमानी है

अपने ही जब अपनों जैसे नहीं रहे
गैरों को अपना कहना बेमानी है

सहरा में ख़ुश्बू को ढूंढने वाले सुन
तेरे बारे कुछ कहना बेमानी है

क्यों औरों की फ़िक्र में ख़ुद को गला रहा
ख़ुद को ही धोखा देना बेमानी है

दस्तानों से हाथ मिला कर क्या हासिल
झूठा है ये याराना बेमानी है

अजय अज्ञात फरीदाबाद हरियाणा
कवि एवं शायर


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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी