ग़ज़ल
रिश्तों को ढोते रहना बेमानी है
प्यार बिना तो हर रिश्ता बेमानी है
जो नन्हे पौधे हैं उन की फ़िक्र करो
ठूंठों को पानी देना बेमानी है
अपने ही जब अपनों जैसे नहीं रहे
गैरों को अपना कहना बेमानी है
सहरा में ख़ुश्बू को ढूंढने वाले सुन
तेरे बारे कुछ कहना बेमानी है
क्यों औरों की फ़िक्र में ख़ुद को गला रहा
ख़ुद को ही धोखा देना बेमानी है
दस्तानों से हाथ मिला कर क्या हासिल
झूठा है ये याराना बेमानी है
अजय अज्ञात फरीदाबाद हरियाणा
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