ग़ज़ल नहीं मुझको मुकद्दर से गिला है



नहीं  मुझको  मुकद्दर से गिला  है।
जो था तक़दीर में उतना मिला है।

हुआ जो  दरम्यान  ये  फासला है।
यकीनन उस ख़ुदा की भी रज़ा है।

मिली थी जब नज़र तुमसे हमारी।
इसे  हम  मानते   इक  हादसा हैं।

तुम्हारा  अक्स  ही दिल में हमारे।
नहीं   दिल  में  कोई तेरे सिवा है।

लिखा  जो दर्द हिस्से में ख़ुदा ने।
बख़ूबी  उम्र  भर हमने  सहा  है।

नफासत में  ढली उसकी अदाएं।
अभी  तक होश मेरा गुमशुदा है।

सुनो हमने तो बस इतना ही जाना
तबाही  का मुहब्बत  जलजला है।

नहीं  आसान है  उल्फत  की राहें।
मुहब्बत दर्द का इक सिलसिला है।

तुम्हे इस दिल ने बस माना ख़ुदा है।
मणि अब किस तरह तुमसे जुदा है।

** मणि बेन द्विवेदी 
वाराणसी उत्तर प्रदेश

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी