ग़ज़ल जरूरत के मुताबिक ढल रहा हूं
ज़रूरत के मुताबिक़ ढल रहा हूं
मैं अपने ढंग का पागल रहा हूं
तुम्हें मुझ पर यकीं हो या ना हो क्या
मैं सारी बज़्म का हलचल रहा हूं
मुझे जो कुछ समझती है ये दुनियां
मगर तेरे लिए बादल रहा हूं
कहां समझा कोई मेरा इरादा
मैं सबके दिल में बस अटकल रहा हूं
जहां तकदीर मुझको ले गई है
मैं सारे दर्द का जंगल रहा हूं
तुम्हें मुझसे मुहब्बत हो गई जो
मैं तेरे प्यार का क़ायल रहा हूं
मेरे बारे में कुछ भी कह लो तुम भी
मगर मैं हर वख़त समतल रहा हूं
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