क्यूं न इक बार

क्यू न इक बार,
खुद को मैं प्यार कर लूं।
इठलाती हुई जिंदगी,
तुझसे मै आँखे चार कर लूं।।

आसमां छूके आने का,
स्वप्न था कभी।
क्यू न एक बार फिर,
वो पंख तैयार कर लूं।

 कुछ गुजर तो गई
कुछ गुजर जाएगी।
क्यू न इक बार फिर,
सोलह सिंगार कर लूं।।

वो पल किसके थे,
कहीं से चुरा लाई मै।
क्यू न एक बार फिर से,
उम्मीदों का बाजार कर लूं।।

वो जो रूठे हैं उनसे,
मैं रूठ जाऊंगी।
क्यू न अपने भी,
नखरे हजार कर लूं।।

उनके ख्वाबो की 'कविता', 
फिर बन जाउंगी।
क्यू न इक बार फिर,
रस की फुहार कर लूं।।

*कविता सक्सेना*शुजालपुर मध्यप्रदेश

टिप्पणियाँ

Praveen Saxena ने कहा…
वाह वाह बहुत ख़ूब कविता जी
Praveen Saxena ने कहा…
वाह वाह बहुत ख़ूब कविता जी