क्यूं न इक बार

क्यू न इक बार,
खुद को मैं प्यार कर लूं।
इठलाती हुई जिंदगी,
तुझसे मै आँखे चार कर लूं।।

आसमां छूके आने का,
स्वप्न था कभी।
क्यू न एक बार फिर,
वो पंख तैयार कर लूं।

 कुछ गुजर तो गई
कुछ गुजर जाएगी।
क्यू न इक बार फिर,
सोलह सिंगार कर लूं।।

वो पल किसके थे,
कहीं से चुरा लाई मै।
क्यू न एक बार फिर से,
उम्मीदों का बाजार कर लूं।।

वो जो रूठे हैं उनसे,
मैं रूठ जाऊंगी।
क्यू न अपने भी,
नखरे हजार कर लूं।।

उनके ख्वाबो की 'कविता', 
फिर बन जाउंगी।
क्यू न इक बार फिर,
रस की फुहार कर लूं।।

*कविता सक्सेना*शुजालपुर मध्यप्रदेश

टिप्पणियाँ

Praveen Saxena ने कहा…
वाह वाह बहुत ख़ूब कविता जी
Praveen Saxena ने कहा…
वाह वाह बहुत ख़ूब कविता जी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी