मन हरण घनाक्षरी

नमन उड़ान
मनहरण- घनाक्षरी

पवन सुरभि उड़े
मदमाती रस पगी,
मदिर मदिर  यह
जादू  करे मोहती।

सर -सर  करे पात 
करे फूल से ये बात,
मगन भँवरे सुने
तितली है सोहती।

बाली हँसी गेहूँ भरी
शाक पात सज रहे,
सरसों फूलती लगे
पिया बाट  जोहती।

झूम रही है वल्लरी
बौर सजी अमराई,
कूक -कूक कोयलिया
नई ऋतु टोहती ।
स्वरचित
विभा भटोरे

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी