मन हरण घनाक्षरी
नमन उड़ान
मनहरण- घनाक्षरी
पवन सुरभि उड़े
मदमाती रस पगी,
मदिर मदिर यह
जादू करे मोहती।
सर -सर करे पात
करे फूल से ये बात,
मगन भँवरे सुने
तितली है सोहती।
बाली हँसी गेहूँ भरी
शाक पात सज रहे,
सरसों फूलती लगे
पिया बाट जोहती।
झूम रही है वल्लरी
बौर सजी अमराई,
कूक -कूक कोयलिया
नई ऋतु टोहती ।
स्वरचित
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