गीत जीना होगा मरना होगा

जग के इस अनसुलझे पथ पर 
सोच समझकर चलना होगा
रोना होगा गाना होगा 
जीना होगा मरना होगा 

जो भी अब अभिव्यक्ति होगी
झूठी बनकर उलझायेगी
लेकिन दुनिया की दृष्टी में
जानें क्या क्या कहलायेगी
अविरल जीवन रुक न सकेगा
हमको संग भी चलना होगा
जग के,,,,,,,,,,
मृण्मय तन का ताना बाना
मिट्टी में मिल जायेगा
सोचो किस पुरुषार्थ के फल पर
नव पल्लव फिर आयेगा
निष्ठा गहरी जिसमें होगी
उस खाई में उतरना होगा
जग के,,,,,,,
निद्रा आलस के बस होकर
लक्ष्य कभी धूमिल हो जाये
जन्मों जन्मों की स्मृतियां
विस्तृत होकर आज जगाते
अब तक कितने  बदल गये हम
कितना और बदलना होगा
जग के,,,,,,,,
अभिलाषायें कुंठित करती
पावन मन के आंगन को
मार सके हम क्या इस तन में
बैठे अपनें रावन को
स्वतः नहीं परिलक्षित होगा
खुद भी इसमें जलना होगा
जग के,,,,,,,

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी