ग़ज़ल जो जुल्मों सितम की वकालत करेंगे
जो जुल्मों सितम की वकालत करेंगे
वो कैसे यहां फिर मुहब्बत करेंगे करें
अगर लौट आया जो बचपन हमारा
तो फिर से वही हम शरारत करेंगे
ज़माने की नज़रों से बचना है मुश्किल
नहीं हर तरफ हम शिकायत करेंगे
वो गैरों से करते हैं रिश्तों की बातें
कहां हमपे इतनी इनायत करेंगे
कसम तोड़ सकते नहीं जिंदगी भर
वतन की हमेशा हिफाज़त करेंगे
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