राम नाम शिला धरी मंदिर बना रघुनाथ का


                
              आओ राम,

राम तुम आओ हृदय के द्वार ये धागा जोड़ दूँ,
श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ।

ये जो जीवन रेत सा मैं सम्भाले जा रही,
रिश्तों को मासूमियत से मैं पाले जा रही,
तुम इशारा दो तो पिंजर देह का मैं छोड़ दूँ।
राम तुम आओ हृदय के।

कितने ही मारीच म्रग बन खड़े हुंकारते,
कितने साधु भेष में रावण नज़र से ताड़ते,
सबक़ सिखलाओ इन्हें तो मन को मैं परवाज़ दूँ।
राम तुम आओ हृदय के द्वार ये धागा जोड़ दूँ,
श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ।
राम तुम आओ हृदय के ,

माँ सिया का हरण कर रावण ने सठ परिचय दिया,
पर बंधा संकल्प से सिय मातु का न परस किया,
मैं भी कृत संकल्प होकर आस तुमसे जोड़ दूँ।
राम तुम आओ हृदय के ।

कितनी भिलिनी हैं खड़ीं राहें रहीं निहारती,
कितने केवट सरयू तट पर नाव निज संवारते,
भावनाओं को संजीवन ,दो तो जीवन बार दूँ।

राम तुम आओ हृदय दर ये धागे जोड़ दूँ,
श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ।
राम तुम आओ हृदय।

राम नाम शिला धरीं मंदिर बना रघुनाथ का,
एक या दो ही नहीं सहयोग है हर हाथ का,
अब सिंघासन आ विराजो नयनों को सिंगार दूँ।

राम तुम आओ हृदय के द्वार ये धागा जोड़ दूँ,
श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ।
डॉक्टर शशि गुप्ता,

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी