ग़ज़ल जिंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे खिलाफ

ज़िंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे ख़िलाफ़
खूब सारी नफरतें करता रहा मेरे ख़िलाफ़

मैं उसे अपना ही समझा वो पराया हो गया
साथ तूफानों के वो चलता रहा मेरे ख़िलाफ़

दुश्मनी तो दुश्मनी है दोस्ती की आड़ में
दुश्मनी की राह में बढ़ता रहा मेरे ख़िलाफ़

सच की दीवारों पे हमने सच लिखा था और वो
झूठ की हर बंदिशें लिखता रहा मेरे खिलाफ़

आज तक भी जान पाया ही नहीं उसकी जुबां
कौन सी वो आयतें पढ़ता रहा मेरे खिलाफ़

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी