ग़ज़ल जिंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे खिलाफ

ज़िंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे ख़िलाफ़
खूब सारी नफरतें करता रहा मेरे ख़िलाफ़

मैं उसे अपना ही समझा वो पराया हो गया
साथ तूफानों के वो चलता रहा मेरे ख़िलाफ़

दुश्मनी तो दुश्मनी है दोस्ती की आड़ में
दुश्मनी की राह में बढ़ता रहा मेरे ख़िलाफ़

सच की दीवारों पे हमने सच लिखा था और वो
झूठ की हर बंदिशें लिखता रहा मेरे खिलाफ़

आज तक भी जान पाया ही नहीं उसकी जुबां
कौन सी वो आयतें पढ़ता रहा मेरे खिलाफ़

आलोक रंजन इंदौरवी

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