ग़ज़ल रिवायत के क़फ़स में फॅंस के लड़की फड़फड़ाती है।

रिवायत के कफ़स में फँस के लड़की फड़फड़ाती है
कि जैसे बाज़ के चंगुल में मछली फड़फड़ाती है 

हवेली की रिवायत हू-ब-हू बंगले में आ पँहुची
यहाँ दासी मचलती है तो रानी फड़फड़ाती है 

कोई जीने नहीं देता कोई मरने नहीं देता 
हज़ारों साल से यूँ ही ये दिल्ली फड़फड़ाती है 

हवा को दोष देने का पुराना है चलन, लेकिन 
पनीले तेल से भी जलती बत्ती फड़फड़ाती है 

किया करती है मकड़ी शान से जिस पर चहलक़दमी
उसी जाले में 'साहिल' फँस के मक्खी फड़फड़ाती है

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी