ग़ज़ल रिवायत के क़फ़स में फॅंस के लड़की फड़फड़ाती है।
रिवायत के कफ़स में फँस के लड़की फड़फड़ाती है
कि जैसे बाज़ के चंगुल में मछली फड़फड़ाती है
हवेली की रिवायत हू-ब-हू बंगले में आ पँहुची
यहाँ दासी मचलती है तो रानी फड़फड़ाती है
कोई जीने नहीं देता कोई मरने नहीं देता
हज़ारों साल से यूँ ही ये दिल्ली फड़फड़ाती है
हवा को दोष देने का पुराना है चलन, लेकिन
पनीले तेल से भी जलती बत्ती फड़फड़ाती है
किया करती है मकड़ी शान से जिस पर चहलक़दमी
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