सरस्वती वंदना

मधुर मोहक सरस स्वर से हृदय का शृंगार कर दो
शारदे मां सद्गुणों का सर्वथा विस्तार कर दो
कुटिलता मेरी मिटे हो प्रेम का नवसृजन अब
भावमय हर वेदना हो दूर हो निस्तार कर दो
मधुर मोहक,,,,,,,,

हृदयपट से प्रार्थना का गान मैं करता रहूं
सत्य निर्मल मंत्रणा का पान मैं करता रहूं
कलुषता हर क्लेश मिट जाये सतत् आये खुशी
शब्द रचना कर सकूं मैं ऐसी शक्ति प्रदान कर दो
कर्म सात्विक हो मेरे जीवन की अंतिम सांस तक
मां विचारों में मेरे करुणा दया का भार भर दो
मधुर मोहक,,,,,,,,,,

सहज हो पथ संचरण सद आचरण में लिप्यता
वरद् हस्तों से भरो मां स्वांस में अब दिब्यता
हर कदम सामिप्य हो तेरा जहां भी मैं रहूं
वाकपटुता से रहे वाणी में मेरी पूर्णता 
धर्म हो आचरण हो अज्ञानता का नाश हो
कर कृपा की दृष्टि अपनी सरल सा ब्यवहार कर दो
मधुर मोहक,,,,,,,,,

आलोक रंजन इंदौरवी

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी