मैं कोई कविता

कविता दिवस पर

 मैं कोई कविता 
बनना नहीं चाहती
बनना चाहती हूं
 हर पृष्ठ का वह कोना 
जहां क्रमांक लिखा होता है
 या कुछ अमिट नाम या 
 शीर्षक लिखा होता है
उसे गढ़ना चाहती हूं

एक पृष्ठ पर सिमटना मंजूर 
नहीं कोई पढ़े और पढ़ कर
 तुरंत चला जाए हर पृष्ठ
 पर लिखा हो कुछ ऐसा
सभी उसको पढ़ना चाहे 
वेदना ऐसी चाहती हूं

किताब के हर एक पन्ने
 पर जरूरत महसूस हो 
उसको देखना चाहती हूं 
हर दर्द को महसूस कर
उसे मिटाना चाहती हूं

काली स्याही के शब्दों 
के द्वारा उस वेदना को
जो किसी चित्र से उभर 
कर कलम पर समा जाए निभाना जानती हूं 
कर सकूं दूसरों के लिए
 कुछ निरंतर पढ़ना चाहती हूं

विश्व की वेदना हो या
 प्रकृति की वेदना हो
यह इंसान की हो वेदना
स्याही के अक्षरों से  
अमिट रहना चाहती हूं

डॉ अरुणा पाठक आभा
 मध्य प्रदेश रीवा

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