यह कैसा दौर है ,चारों ओर शोर है ,इंसा की कीमत नहीं, आज कहीं ओर है।दुखता है दिल यहां, रोती है आंखें यहां, पग पग पर होती है परीक्षाएं भी यहां।नहीं आंसुओं की कीमत, दर्द चारों ओर है, मिलते है चोर डाकू, देखो हर मोड़ है।सहन शक्ति और आदर्शों का शोर है,दिलों के भीतर देखो, पाप चारों ओर है।अच्छाई दिखती नहीं, यहां किसी छोर है, आंखों में लाज शर्म, आज नहीं ओर है ।मिलते हैं हंस कर,पीछे रुलाता हर कोर है,होठों को सिता नहीं ,जमाना किस ओर है।सूखे हैं खेत यहां, सूखे खलीहान है,पनघट पर अब नहीं, जाता कोई ओर है।प्यासी है आंखे और ,दिल रोता तार-तार है,जर्रे जर्रे में देखो ,बेवफाई हर ओर है।ये ऐसादौर है इंसान गिरे तो, हंसी चहूं ओर है, मोबाइल गिरे तो दिल होता चकनाचूर है।ऋतु गर्ग,सिलिगुड़ी,पश्चिम बंगालस्वरचित मौलिक रचनाgargritu0101@gmail.com

टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बहुत बढ़िया शानदार

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी