ग़ज़ल छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की
ग़ज़ल
छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की
हरिक शय ने तब तब तेरी बात की
जिसे मैंने चाहा वही न मिला
मुक़द्दर ने क्यों ऐसी हरक़ात की
उठा दर्द दिल में अचानक से क्यों
झड़ी लग गयी क्यों ख़्यालात की
हुई ज़िंदगानी जो मुझ से ख़फ़ा
तो मौसम ने भी जम के बरसात की
न हम कह सके कुछ न तुमने कहा
बड़ी मुख़्तसर सी मुलाक़ात की
बयां मैंने तुमसे जो क़िस्सा किया
कहानी है वो मेरे हालात की
ख़िलाफ़-ए-तवक़्क़ो रहा माज़रा
समझ भी न आई बजूहात की
कुसुम शर्मा अंतरा
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