ग़ज़ल छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की

ग़ज़ल

छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की
हरिक शय ने तब तब तेरी बात की

जिसे मैंने चाहा वही न मिला
मुक़द्दर ने क्यों ऐसी हरक़ात की

उठा दर्द दिल में अचानक से क्यों
झड़ी लग गयी क्यों ख़्यालात की

हुई ज़िंदगानी जो मुझ से ख़फ़ा
तो मौसम ने भी जम के बरसात की

न हम कह सके कुछ न तुमने कहा
बड़ी मुख़्तसर सी मुलाक़ात की

बयां मैंने तुमसे जो क़िस्सा किया
कहानी है वो मेरे हालात की

ख़िलाफ़-ए-तवक़्क़ो रहा माज़रा
समझ भी न आई बजूहात की

कुसुम शर्मा अंतरा
जम्मू कश्मीर

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
बेहतरीन ग़ज़ल
बेनामी ने कहा…
मेरी ग़ज़ल को इतना खूबसूरत पटल देने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
बेनामी ने कहा…
बेहतरीन रचना
बेनामी ने कहा…
Waaah ji kamaal

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी