मंजिलों का पता रास्तों से मिला

ग़ज़ल

मंज़िलों का पता रास्तों से मिला 
आँसुओं का पता कहकहों से मिला

 मुस्तहब होती हैं ज़ीस्त में दूरियाँ
क़ुर्बतों का पता फ़ासलों से मिला

बेख़बर ही रहे वक़्त की चाल से
झुर्रियों का पता आईनों से मिला

राहतें ज़िंदगी की मिली हैं मगर 
राहतों का पता मुश्किलों से मिला

इससे पहले कहाँ जानते थे ये दर्द 
रतजगों का पता फ़ुर्क़तों से  मिला 

ये अँधेरे उजालों की उम्मीद हैं 
जुगनुओं का पता ज़ुल्मतों से मिला 

कल समंदर की मौजों ने मुझ से कहा 
वुसअतों का पता तो दिलों से मिला 

आज अख़बार में आई है ये ख़बर 
क़ातिलों का पता कैमरों से मिला

जब' सुमन'वो दबे पाँव आए इधर
आहटों का पता धड़कनों से मिला

सुमन ढींगरा दुग्गल

टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बेहतरीन रचना शुभकामनाएं
Alok ranjan ने कहा…
बेहतरीन रचना शुभकामनाएं

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