ग़ज़ल
मुहब्बत की नज़रों से हम देखते हैं।
ये माना कि हम थोङा कम देखते है।
जो बैठे है चहरे पे चहरा लगाये।
वो शीशे में अपना अहम देखते है।।
जो लगते थे हमको ज़माने से प्यारे।
वो रिश्तों में हरदम भरम देखते हैं।।
भलाई के जज़्बे को सीने में रखकर।
ये दुनियां बङी बेरहम देखते है।।
यहां अब है इन्सानियत सिर्फ धोखा।
कुचलने को हरदम क़दम देखते है।।
है उन पर हमेशा क़रिश्मा ए कुदरत ।
जो इक दूजे की आंखे नम देखते हैं।।
इनायत ख़ुदा की है सब पर बराबर।
ग़रीबी पे फिर भी सितम देखते हैं।।
पुष्प लता राठौर
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