ग़ज़ल

मुहब्बत  की नज़रों से हम देखते हैं।
ये माना कि हम थोङा कम देखते है।

जो  बैठे  है  चहरे  पे चहरा  लगाये।
वो  शीशे में अपना अहम देखते है।।

जो लगते थे हमको ज़माने से प्यारे। 
वो रिश्तों में हरदम  भरम  देखते हैं।।

भलाई के जज़्बे को सीने में रखकर।
ये  दुनियां  बङी  बेरहम  देखते  है।।

यहां अब है इन्सानियत सिर्फ धोखा।
कुचलने को हरदम  क़दम देखते है।।

है उन पर हमेशा क़रिश्मा ए कुदरत ।
जो इक दूजे की आंखे नम देखते हैं।।

इनायत ख़ुदा की है सब पर बराबर।
ग़रीबी पे  फिर भी  सितम देखते हैं।।
       पुष्प लता राठौर
फरीदाबाद हरियाणा

टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बेहतरीन रचना हार्दिक बधाई
बेनामी ने कहा…
बहुत शानदार

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी