मृत्यु को उत्सव बना दूंगी

मृत्यु को उत्सव बना दूंगी
आएगी जब मुस्कुरा दूंगी.....

द्वार पर उसके लिए मैं अल्पनाएं डाल दूंगी
और देहरी पर प्रतीक्षा का दिया भी बाल दूंगी
पुष्प वाले तोरणों से द्वार को सज्जित करूंगी
और घर में एक आयोजन करा दूंगी
आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।।

उसके स्वागत के लिए मैं भोग छप्पन पाक दूँगी
थाल सोने का सजा कर एक पीढ़ा डाल दूँगी
और फिर पकवान से थाली सजा करके
हाथ से अपने उसे कौरा खिला दूंगी
आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।।

लौटने जब वो लगेगी हाथ उसका थाम लूंगी
साथ चलती हूँ तुम्हारे , बिन कहे सब मान लूंगी
और इस जग का यहीं सब छोड़ करके
उसके पीछे डग बढ़ा दूंगी
आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।।



स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता
लखनऊ उत्तर प्रदेश

टिप्पणियाँ

Alok ranjan ने कहा…
बेहतरीन रचना

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