ग़ज़ल कभी छुप छुपके मिलना

गज़ल


कभी छुप छुप के मिलना औ'र कभी इकरार करना भी।
मुसीबत हो गया है यार अब तो प्यार करना भी।

मुहब्बत में जो चाहे हो सभी कुछ अच्छा लगता है,
कभी इनकार करना भी कभी तकरार करना भी।

किसी से कम मिला है तो बहुत से है मिला ज्यादा,
जो मिलता है खुशी से सीखिए स्वीकार करना भी।

किया है प्यार बचपन में सभी मां बाप ने सबको,
हमारा फर्ज उन पर प्यार की बौछार करना भी।

कोई भी काम नामुमकिन कहां होता है दुनियां में,
अगर हो हौसला मुमकिन समंदर पार करना भी।

मिला जो ज्ञान गौतमबुद्ध मीरा औ'र कबीरा से,
कि उनसे सीख ले दुनियां उसे विस्तार करना भी।

कदम रखने से पहले प्यार में 'प्रेमी' सबक सीखो,
करे गर प्यार कोई प्यार से मनुहार करना भी।

.......✍️  सत्य कुमार प्रेमी
नोएडा, गौतमबुद्ध नगर, उ प्र.
मो. 8896838938

टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
प्रेमी जी, कविता बड़ी ह्रदय स्पर्शी है। इसी तरह आगे बढ़ते रहें।
संजय कुमार ने कहा…
बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।सादर नमस्कार।
संजय कुमार ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी