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गीत मैं अपनी पहचान बनूंगी

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बाधाएं कितनी आ जाएं कदम नहीं डिगने दूंगी सनातन और प्रेम को कभी नहीं झुकने दूंगी सत्य सनातन संस्कृति अपनी मैं इसका सम्मान करूंगी  मैं अपनी पहचान बनूंगी भारत माता के चरणों में नित नित शीश झुकाऊं में देश प्रेम की अलग जगह कर इस पर बलि बलि जाऊं मैं भारत की संप्रभुता का विस्तृत में अभी अभियान बनूंगी मैं अपनी पहचान बनूंगी अपने आदर्शों का सम्यक पालन करती जाऊंगी सद्विचार दृढ़ संकल्प ओं से आगे बढ़ती जाऊंगी अपने बलबूते के बल पर भारत की में शान बनूंगी मैं अपनी पहचान बनूंगी निरूपमा त्रिवेदी इन्दौर मप्र

ग़ज़ल ज़माने की रविश के साथ तुम बहती नदी निकले

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ज़माने की रविश के साथ तुम बहती नदी निकले, बहुत उम्मीद थी तुमसे मगर तुम भी वही निकले। हर इक शय पर वो क़ादिर है अगर उसकी रज़ा हो तो, चराग़ों से उठे ख़ुश्बू गुलों से रौशनी निकले । किसी को बे वफ़ा कहने से पहले सोच भी लेना, कहीं ऐसा न हो इसमें तेरी अपनी कमी निकले। जिसे देखे ज़माना हो गया इस आख़री पल में , नज़र आ जाए वो चेहरा तो दिल की बेकली निकले। जहाँ शीशे का दिल देखा वहीं को हो लिए सारे, तुम्हारे शह्र के पत्थर बड़े ही पारखी निकले । वफ़ा की राख दरिया में बहा आओ कि फिर उसमें, कहीं ऐसा न हो फिर कोई चिंगारी दबी निकले। शिखा नक़्क़ाद के मीज़ान पर थी जब ग़ज़ल मेरी, रदीफ़ ओ क़ाफ़िया औज़ान सब बिल्कुल सही निकले। दीपशिखा-

अवचेतन मन की अभिव्यक्ति

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अवचेतन ये बात अब इस दौर की भी है... यहां स्वयं का स्वयं के साथ खडा़ होना बहुत जरुरी है तुम वही दिल हो न? जिसने विरानगी में भी शोर को सुना है और शोर में भी खामोशी को सुना है, हाँ तुम वही मन हो जिसने खुद को अनसुना किया था आज तक  और आज तुम जब इसको सुन रहे हो,यकीनन सबकी नज़रों से बहुत दूर हो...  तो जी लो अब इसको भी  और देखो कौन पुकारता है मुढ़कर तुम्हें? इस गहरे मन के सन्नाटों में देगी सुनाई एक आवाज़ और जब वो सुनाई दे तुम्हें तब तुम ध्यान से गौर फरमा लेना उस पर हो सके तो भरोसा करके चल देना अकेले ही उस राह पर।। दिव्या सक्सेना कलम वाली दीदी

जब से तन्हाइयों के घर आया

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जबसे तन्हाइयों के घर आया तेरा चेहरा नहीं नज़र आया अब कहीं क्या उड़ान भरना है आसमां से तो मैं उतर आया रात पूनम की रोशनी देखो  झील में तैरता क़मर आया अश्क़ से आंख मेरी हर आई जब भी उनका कोई जिकर आया तेरे घर का कोई जवाब नहीं जब भी आया तो बेफिकर आया तुम जहां सोचते हो जानें को मैं वहां से कभी गुज़र आया ख़ाक छानी है सारी दुनियां की यूं न मुझको नया हुनर आया आलोक रंजन इंदौरवी इन्दौर मप्र

वो जो मेरी मुट्ठी में मेरी जान लिए बैठी है

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ग़ज़ल  वो जो मुट्ठी में मेरी जान लिए बैठी है वो किसी और का अरमान लिए बैठी है जो मेरे दर्द का सामान लिए बैठी है वो भी क्या सीने में तूफ़ान लिए बैठी है वरना महताब सा होता नहीं चेहरा उसका वो मेरी आन मेरी शान लिए बैठी है नाम सुनते ही मेरा चौंक सी जाती है जो मेरी धड़कन मेरी पहचान लिए बैठी है मेरी कोई भी ग़ज़ल मेरी नहीं अब यारो इक परी रू मेरा दीवान लिए बैठी है वो जो मासूम सी लगती है सभी को रुख़ से हर किसी शख़्स का ईमान लिए बैठी है यूँ मुहब्बत का नहीं होता कोई पैमाना वो मगर हाथ में मीज़ान लिए बैठी है आप कहते हो जिसे प्यार की मूरत वो तो मेरी नींदें मेरी मुस्कान लिए बैठी है अब मुहब्बत में मुझे होश कहाँ है 'मीरा' एक लड़की मेरे औसान लिए बैठी है *** मनजीत शर्मा 'मीरा' चंडीगढ़।

मंजिलों का पता रास्तों से मिला

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ग़ज़ल मंज़िलों का पता रास्तों से मिला  आँसुओं का पता कहकहों से मिला  मुस्तहब होती हैं ज़ीस्त में दूरियाँ क़ुर्बतों का पता फ़ासलों से मिला बेख़बर ही रहे वक़्त की चाल से झुर्रियों का पता आईनों से मिला राहतें ज़िंदगी की मिली हैं मगर  राहतों का पता मुश्किलों से मिला इससे पहले कहाँ जानते थे ये दर्द  रतजगों का पता फ़ुर्क़तों से  मिला  ये अँधेरे उजालों की उम्मीद हैं  जुगनुओं का पता ज़ुल्मतों से मिला  कल समंदर की मौजों ने मुझ से कहा  वुसअतों का पता तो दिलों से मिला  आज अख़बार में आई है ये ख़बर  क़ातिलों का पता कैमरों से मिला जब' सुमन'वो दबे पाँव आए इधर आहटों का पता धड़कनों से मिला सुमन ढींगरा दुग्गल

कविता छंद

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.              7 जगण अंत यगण                      छन्द बताएं                            *** त्रिभंग कदम्ब त्रिभंग शरीर                            सपीत पटा सरसीरुह रंगी। विभूषित माल मनोहर अंग                            अनंग लजावन मोहन अंगी। खड़ा वन वेणु धरे अधरा पर                           गूँज अरण्य गया रस रंगी। विलोकन बांक सु बांक शरीर                         हरे मन पीर विलोक त्रिभंगी।।                                  ।।श्रीधर।।

ग़ज़ल अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं

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अदाकारी जिन्हें आती वो अपना फ़न दिखाते हैं मगर कुछ लोग हैं ऐसे हैं जो केवल तन दिखाते हैं जहां में लोग हैं ऐसे गरीबी पर जो हंसते हैं मगर कुछ लोग हैं ऐसे जो अपनापन दिखाते हैं बहू और बेटियां पहुंची हैं देखो आसमानों पर यहां कुछ लोग तो उनके लिए बंधन दिखाते हैं सियासत जब गलत रास्ते को ही अंजाम देती है तो सच्चे लोग मिलकर के यहां अनशन दिखाते हैं बने हैं संगठन कितने रसीदी कागजों पर ही मगर जब काम आए तो सभी अनबन दिखाते हैं नवाबी पहनकर कुर्ता बड़े जो ठाठ से रहते चमेली देखकर स्टेज पर थिरकन दिखाते हैं पुराने घर का वह माहौल कितना प्यारा प्यारा था हम अपने गांव जाकर बस वही आंगन दिखाते हैं आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की

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ग़ज़ल छिड़ी दास्तां ख़ास लम्हात की हरिक शय ने तब तब तेरी बात की जिसे मैंने चाहा वही न मिला मुक़द्दर ने क्यों ऐसी हरक़ात की उठा दर्द दिल में अचानक से क्यों झड़ी लग गयी क्यों ख़्यालात की हुई ज़िंदगानी जो मुझ से ख़फ़ा तो मौसम ने भी जम के बरसात की न हम कह सके कुछ न तुमने कहा बड़ी मुख़्तसर सी मुलाक़ात की बयां मैंने तुमसे जो क़िस्सा किया कहानी है वो मेरे हालात की ख़िलाफ़-ए-तवक़्क़ो रहा माज़रा समझ भी न आई बजूहात की कुसुम शर्मा अंतरा जम्मू कश्मीर

कविता

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तुम्हारी चौखट पे कैसे आऊं तुम्हारे घर का पता नही है। तुम्हारे क़दमों में सर झुकाऊं तुम्हारे दर का पता नही है। भटक न जाऊं मैं तेरी शरण से। छुङा दो पीछा जनम - मरण से। तुम्हारे मंदिर में कैसे आऊं मुझे नगर का पता नही है।। मीरा के जैसा मैं बिष पान कर लूं। कान्हा की बंशी का रसपान कर लूं। तुम्हारी भक्ति में कैसे पाऊं मुझे ज़हर का पता नही है।। अगम अगाध अनादि अनन्ता। सुमिर -सुमिर पद गावहि संता।  तुम्हारी महिमा मैं कैसे गाऊं मुझे बहर का पता नही है। चितचोर गिरधर हौ बंशी बजइया। माखन चुरइया हौ यसोदा के छइया। तुम्हारी मुरली की धुन बजाऊं मुझे पहर का पता नही है। बरसाने वारी पै बलि-बलि जाऊं। कृष्ण कन्हाई कौ कैसे रिझाऊं। तुम्हारी आंखो में देख पाऊं मुझे नज़र का पता नही है।    पुष्प लता राठौर फरीदाबाद हरियाणा

ग़ज़ल

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मुस्कराने की भी तरकीब बताओ यारों कोइ हंसती हुई तस्वीर दिखाओ यारों लोग उलझे हैं यहां अपनी ताजपोशी में आओ जल्दी से ये दरबार सजाओ यारों ऐसा कातिल है जिसे देख नहीं पायेगें उसके ही नाम पर व्यापार चलाओ यारों क्यों सरेआम मरे लोग दिखाते हो तुम जो हैं जिंदा उन्हें दो वक्त खिलाओ यारों सरजमी अपनी है बदनामी भी अपनी होगी वक्त की मार है दुश्वार दिखाओ यारों तेज आंधी है ये छप्पर उड़ा भी सकती है एक होकर के ज़रा रब को पुकारो यारों सब को पहचानना तो काम बड़ा मुश्किल है जिन को पहचानो उन्हें और पहचानो यारों आलोक रंजन इंदौरवी इन्दौर मप्र

ग़ज़ल

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मुहब्बत  की नज़रों से हम देखते हैं। ये माना कि हम थोङा कम देखते है। जो  बैठे  है  चहरे  पे चहरा  लगाये। वो  शीशे में अपना अहम देखते है।। जो लगते थे हमको ज़माने से प्यारे।  वो रिश्तों में हरदम  भरम  देखते हैं।। भलाई के जज़्बे को सीने में रखकर। ये  दुनियां  बङी  बेरहम  देखते  है।। यहां अब है इन्सानियत सिर्फ धोखा। कुचलने को हरदम  क़दम देखते है।। है उन पर हमेशा क़रिश्मा ए कुदरत । जो इक दूजे की आंखे नम देखते हैं।। इनायत ख़ुदा की है सब पर बराबर। ग़रीबी पे  फिर भी  सितम देखते हैं।।        पुष्प लता राठौर फरीदाबाद हरियाणा

ग़ज़ल

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तेरी मेरी जो आशनाई है ये तो उस रब ने ही बनाई है मेरे दिल में कसक सी उठती है ऐसी लिख दी जो ये रुबाई है दर्द ठहरा है दिल के कोने में जबसे वो दास्तां सुनाई है अब न जायज़ है मशवरा उनका अब न इसकी कोई दवाई है इश्क़ तन्हाहाइयों से हैं मेरा मैंने ऐसी लगन लगाई है उसका चेहरा उदास रहता है जाने कैसी कसम ये खाई है उसके जैसा नहीं कोई रंजन सारी दुनियां भी आजमाई है आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल

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तेरी मेरी जो आशनाई है ये तो उस रब ने ही बनाई है मेरे दिल में कसक सी उठती है ऐसी लिख दी जो ये रुबाई है दर्द ठहरा है दिल के कोने में जबसे वो दास्तां सुनाई है अब न जायज़ है मशवरा उनका अब न इसकी कोई दवाई है इश्क़ तन्हाहाइयों से हैं मेरा मैंने ऐसी लगन लगाई है उसका चेहरा उदास रहता है जाने कैसी कसम ये खाई है उसके जैसा नहीं कोई रंजन सारी दुनियां भी आजमाई है आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल

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चारों तरफ विवाद करें तो क्या करें है नफरत की आग करें तो क्या करें सबकी अपनी अपनी डफली बजती है अपना अपना राग करें तो क्या करें समझाएं भी किसको कोई कम भी नहीं झट होता नाराज़ करें तो क्या करें राजनीति का चक्कर बहुत निराला है मुल्क हुआ बर्बाद करें तो क्या करें आरोपों से कौन यहां पर वंचित है सब में है कुछ दाग करें तो क्या करें कोई लाखों और करोड़ों में खेले कोई रोटी पानी को मोहताज करें तो क्या करें। फिर भी भारत सारी दुनिया से अच्छा इस पर हम को नाज करें तो क्या करें आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल

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चारों तरफ विवाद करें तो क्या करें है नफरत की आग करें तो क्या करें सबकी अपनी अपनी डफली बजती  है अपना अपना राग करें तो क्या करें समझाएं भी किसको कोई कम भी नहीं झट होता नाराज़ करें तो क्या करें राजनीति का चक्कर बहुत निराला है मुल्क हुआ बर्बाद करें तो क्या करें आरोपों से कौन यहां पर वंचित है सब में है कुछ दाग करें तो क्या करें कोई लाखों और करोड़ों में कोई रोटी को मोहताज करें तो क्या करें। फिर भी भारत सारी दुनिया से अच्छा इस पर हम को नाज करें तो क्या करें आलोक रंजन इंदौरवी