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मई, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आपका हंसी चेहरा

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"आपका हसीं चेहरा, माहताब जैंसा है जिसको लोग पढ़ते हैं, उस किताब जैंसा है                    माफ़ कीजिये मेरी, हर ख़ता मुहब्बत में आपका ख़फ़ा होना, इंक़लाब जैंसा है                   क्या करूंगी मैं तुमसे, आज गुलिस्तां लेकर फूल मेरे दामन में,जब गुलाब जैंसा है                    मैं मज़ाजी दुनियां में, और की अमानत हूँ आपसे मेरा मिलना, सिर्फ ख्वाब जैंसा है                    आप इस जगह आकर, क्या दीये जलाओगे रोशनी का ये आलम, आफ़ताब जैंसा है                     ज़िंदगी गुज़ारो तुम, प्यार और मुहब्बत से आदमी का ये जीवन इक हुबाब जैंसा है                   लोग तंज़ करते हैं, "वंदना" गरीबों पर मुफ़लिसी में जीना भी, इक अज़ाब जैंसा है ...!" वंदना विशेष गुप्ता लखनऊ उत्तरप्रदेश

ग़ज़ल जिंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे खिलाफ

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ज़िंदगी भर साजिशें रचता रहा मेरे ख़िलाफ़ खूब सारी नफरतें करता रहा मेरे ख़िलाफ़ मैं उसे अपना ही समझा वो पराया हो गया साथ तूफानों के वो चलता रहा मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनी तो दुश्मनी है दोस्ती की आड़ में दुश्मनी की राह में बढ़ता रहा मेरे ख़िलाफ़ सच की दीवारों पे हमने सच लिखा था और वो झूठ की हर बंदिशें लिखता रहा मेरे खिलाफ़ आज तक भी जान पाया ही नहीं उसकी जुबां कौन सी वो आयतें पढ़ता रहा मेरे खिलाफ़ आलोक रंजन इंदौरवी

दीप जलाकर देहरी पर

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दीप जलाकर देहरी पर जब तुलसी की पूजा होगी हृदय कुंज में कुंज बिहारी मुरती की पूजा होगी नकारात्मक राजनीति का ये भी ऐसा पहलू है जब कुर्सी पर बैठ गए तो कुर्सी की पूजा होगी डर डर कर के जीने वालों को वो आज समझते हैं उल्टी-सीधी उनकी बंदर घुड़की की पूजा होगी अपनी संस्कृति की मर्यादा हमको आज बचाना है चलो दशहरे के दिन भाला बरछी की पूजा होगी मंदिर खुलने और बंद होने की सीमा निश्चित है मन मंदिर में कान्हा तेरी मरजी की पूजा होगी आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल आपके दिल में जो हो कहा कीजिए

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आपके दिल में जो हो कहा कीजिए पर मेरे दिल में हरदम रहा कीजिए ख़ानदानी रिवाज़ों पे मत जाइये इश्क़ का मामला है ख़ता कीजिए बोतलों का नशा तो उतर जायेगा खत्म हो ना कभी वो नशा कीजिए जिंदगी  ये गुज़र  जाएगी  चैन से उसके घर का कभी तो पता कीजिए जिसने इंसाफ की पैरवी कर दिया क्या ज़रूरत है उससे दग़ा कीजिए फ़र्ज़ जिसने सियासत में जाना नहीं आपका हक़ है उसको दफा कीजिए ज़िंदगी का तजुर्बा यही कह रहा बेवफाई नहीं बस वफा कीजिए आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में।ग़ज़ल जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में! फिर तो जरूर आएगा तू मेरे ख़्वाब में!! गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे! मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!! ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी! अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!! जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला! अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!! क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं! कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!! ..आभा सक्सेना दूनवी

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ग़ज़ल  जब नाम तेरा लिख लिया दिल की क़िताब में!  फिर तो जरूर  आएगा तू मेरे ख़्वाब में!!  गजलें लिखीं हैं और कई छंद भी लिखे!  मुझ को मिली हैं शोहरतें जैसे ख़िताब में!!  ताऊन नफ़रतों की मेरी ज़ीस्त में बढ़ी!  अब क्या बताएं क्या रखा है इस इताब में!!  जो भी मिला है मुझ को सभी सूद में मिला!  अपना किया ही दिख रहा अपने हिसाब में!!   क़ासिद को जब भी देखती हूँ सोचती हूँ मैं!  कुछ तो जवाब आएगा ख़त के जवाब में!!   ..आभा सक्सेना दूनवी

ग़ज़ल जरूरत के मुताबिक ढल रहा हूं

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ज़रूरत के मुताबिक़ ढल रहा हूं मैं अपने ढंग का पागल रहा हूं तुम्हें मुझ पर यकीं हो या ना हो क्या मैं सारी बज़्म का हलचल रहा हूं मुझे जो कुछ समझती है ये दुनियां मगर तेरे लिए बादल रहा हूं कहां समझा कोई मेरा इरादा मैं सबके दिल में बस अटकल रहा हूं जहां तकदीर मुझको ले गई है मैं सारे दर्द का जंगल रहा हूं तुम्हें मुझसे मुहब्बत हो गई जो मैं तेरे प्यार का क़ायल रहा हूं मेरे बारे में कुछ भी कह लो तुम भी मगर मैं हर वख़त समतल रहा हूं आलोक रंजन इंदौरवी

भर देती हो शब्द सुनहरे

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भर देती हो शब्द सुनहरे,गाकर मीठी तान  काले अक्षर बन जाते हैं, मोती की मुसकान ,  कोयल छेड़ो फिर से तान ,कोयल ...... कुहू-कुहू की रट लगाकर ,किसको पास बुलाती ? किस वन में छुपती हो जाकर, कहाँ से फिर आ जाती ? तेरे स्वागत में पेड़ों ने, पहने नये परिधान । कोयल छेड़ो फिर से तान ,कोयल .......! बूढ़े बरगद की स्मृति में, पीपल की छाया में, तुम्हें देखने की उत्कंठा, जीवन की माया में, भरती नूतन प्राण,कोयल छेड़ो फिर से तान, कोयल छेड़ो फिर से तान .......! कश्मीरा सिंह ।

मैं कोई कविता

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कविता दिवस पर  मैं कोई कविता  बनना नहीं चाहती बनना चाहती हूं  हर पृष्ठ का वह कोना  जहां क्रमांक लिखा होता है  या कुछ अमिट नाम या   शीर्षक लिखा होता है उसे गढ़ना चाहती हूं एक पृष्ठ पर सिमटना मंजूर  नहीं कोई पढ़े और पढ़ कर  तुरंत चला जाए हर पृष्ठ  पर लिखा हो कुछ ऐसा सभी उसको पढ़ना चाहे  वेदना ऐसी चाहती हूं किताब के हर एक पन्ने  पर जरूरत महसूस हो  उसको देखना चाहती हूं  हर दर्द को महसूस कर उसे मिटाना चाहती हूं काली स्याही के शब्दों  के द्वारा उस वेदना को जो किसी चित्र से उभर  कर कलम पर समा जाए निभाना जानती हूं  कर सकूं दूसरों के लिए  कुछ निरंतर पढ़ना चाहती हूं विश्व की वेदना हो या  प्रकृति की वेदना हो यह इंसान की हो वेदना स्याही के अक्षरों से   अमिट रहना चाहती हूं डॉ अरुणा पाठक आभा  मध्य प्रदेश रीवा

ग़ज़ल कभी छुप छुपके मिलना

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गज़ल कभी छुप छुप के मिलना औ'र कभी इकरार करना भी। मुसीबत हो गया है यार अब तो प्यार करना भी। मुहब्बत में जो चाहे हो सभी कुछ अच्छा लगता है, कभी इनकार करना भी कभी तकरार करना भी। किसी से कम मिला है तो बहुत से है मिला ज्यादा, जो मिलता है खुशी से सीखिए स्वीकार करना भी। किया है प्यार बचपन में सभी मां बाप ने सबको, हमारा फर्ज उन पर प्यार की बौछार करना भी। कोई भी काम नामुमकिन कहां होता है दुनियां में, अगर हो हौसला मुमकिन समंदर पार करना भी। मिला जो ज्ञान गौतमबुद्ध मीरा औ'र कबीरा से, कि उनसे सीख ले दुनियां उसे विस्तार करना भी। कदम रखने से पहले प्यार में 'प्रेमी' सबक सीखो, करे गर प्यार कोई प्यार से मनुहार करना भी। .......✍️  सत्य कुमार प्रेमी नोएडा, गौतमबुद्ध नगर, उ प्र. मो. 8896838938

खुशियों से कर लूॅं श्रृंगार

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श्रृंगार खुशिओं से कर लूँ श्रृंगार, गम से करूँ बातें दो चार ।। खामियों से करती इकरार । जीवन के मोती हजार ।।   खाशियत का करते ब्यापार  जिंदगी से करते ना प्यार ||  जिंदगी से हुई मुलाकात । खुशिओं की आई बारात ।।  नयनों से ऐसे न निहार । जीवन में आएगी बहार ।।  @ डॉ मीरा त्रिपाठी पांडेय           मुम्बई महाराष्ट्र, भारत ।

प्रेम गीत

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,         ❤️*प्रेम/गीत*❤️ प्यार  केरि  छैंया  बैठि  सस्तैबै। दिलन केरि नदियां गोता लगैवै।। तुम मत दिखलावौ बाल्टी छूंछी। आबौ  पास बैठि खैरियत पूछी।। गंगा  के  जल  से  जिया  नहिलाई। घोलि-घोलि मिश्री दिलका पिलाई।। दिलों की बढती दिखे मोरि थडकन। प्यार के बवंडर दिल केरि फड़कन।। एक  दूजे  दिल मां प्यार खिलैबै। दिलन  केरि नदियां गोता लगैबै।१।               ❤️🇹🇯१❤️ गंगा जैस पावन मन -मन भावन। वृंदावन नगरिया लोक लुभावन।। बांसुरी की ध्वनि दौडि आय गैंया। प्रेम  की बगलिया खड़ा कन्हैया।। अंधियार   छायो   नेह    पगदंडी। प्यार केरि जग म फूटि रही हंडी।। प्रेम- प्यार  किस्से  अपने सुनैबै। दिलन केरि नदियां गोता लगैबै।२।             ❤️🇹🇯२❤️ आओ  झुलाई  प्यार  की झुलनियां। एक दिन बनाइब तुमका दुल्हनियां।। गंगा   मैया   की  सौगंध  तुमका। छोड़ेउ न हथवा मझधार हमका।। नय...

ग़ज़ल नहीं मुझको मुकद्दर से गिला है

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नहीं  मुझको  मुकद्दर से गिला  है। जो था तक़दीर में उतना मिला है। हुआ जो  दरम्यान  ये  फासला है। यकीनन उस ख़ुदा की भी रज़ा है। मिली थी जब नज़र तुमसे हमारी। इसे  हम  मानते   इक  हादसा हैं। तुम्हारा  अक्स  ही दिल में हमारे। नहीं   दिल  में  कोई तेरे सिवा है। लिखा  जो दर्द हिस्से में ख़ुदा ने। बख़ूबी  उम्र  भर हमने  सहा  है। नफासत में  ढली उसकी अदाएं। अभी  तक होश मेरा गुमशुदा है। सुनो हमने तो बस इतना ही जाना तबाही  का मुहब्बत  जलजला है। नहीं  आसान है  उल्फत  की राहें। मुहब्बत दर्द का इक सिलसिला है। तुम्हे इस दिल ने बस माना ख़ुदा है। मणि अब किस तरह तुमसे जुदा है। ** मणि बेन द्विवेदी  वाराणसी उत्तर प्रदेश

मृत्यु को उत्सव बना दूंगी

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मृत्यु को उत्सव बना दूंगी आएगी जब मुस्कुरा दूंगी..... द्वार पर उसके लिए मैं अल्पनाएं डाल दूंगी और देहरी पर प्रतीक्षा का दिया भी बाल दूंगी पुष्प वाले तोरणों से द्वार को सज्जित करूंगी और घर में एक आयोजन करा दूंगी आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।। उसके स्वागत के लिए मैं भोग छप्पन पाक दूँगी थाल सोने का सजा कर एक पीढ़ा डाल दूँगी और फिर पकवान से थाली सजा करके हाथ से अपने उसे कौरा खिला दूंगी आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।। लौटने जब वो लगेगी हाथ उसका थाम लूंगी साथ चलती हूँ तुम्हारे , बिन कहे सब मान लूंगी और इस जग का यहीं सब छोड़ करके उसके पीछे डग बढ़ा दूंगी आएगी जब मुस्कुरा दूंगी।। स्वधा रवींद्र उत्कर्षिता लखनऊ उत्तर प्रदेश

दिल कहेगा कि सियासत लिखना

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दिल कहेगा कि सियासत लिखना  फर्ज ये है कि मुहब्बत लिखना मुहब्बत लिख अगर नहीं सकते  कम से कम आप हकीकत लिखना सच अगर है नहीं पता पूरा    यही अच्छा कि उसे मत लिखना जानते आप बात हैं  जितनी   आप उतनी ही इबारत लिखना मत कहो यह कि ज़माना है बुरा हुआ जो आप वो फकत लिखना बचेंगे शब्द मिटेंगे हम जब समझकर इनको विरासत लिखना यूं ही कुछ भी लिखने से अच्छा है किसी अपने को एक खत लिखना  न किसी और से सही  बेहतर आज 'यश' कल से तो उन्नत लिखना यशपाल सिंह यश

सरस्वती वंदना

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मधुर मोहक सरस स्वर से हृदय का शृंगार कर दो शारदे मां सद्गुणों का सर्वथा विस्तार कर दो कुटिलता मेरी मिटे हो प्रेम का नवसृजन अब भावमय हर वेदना हो दूर हो निस्तार कर दो मधुर मोहक,,,,,,,, हृदयपट से प्रार्थना का गान मैं करता रहूं सत्य निर्मल मंत्रणा का पान मैं करता रहूं कलुषता हर क्लेश मिट जाये सतत् आये खुशी शब्द रचना कर सकूं मैं ऐसी शक्ति प्रदान कर दो कर्म सात्विक हो मेरे जीवन की अंतिम सांस तक मां विचारों में मेरे करुणा दया का भार भर दो मधुर मोहक,,,,,,,,,, सहज हो पथ संचरण सद आचरण में लिप्यता वरद् हस्तों से भरो मां स्वांस में अब दिब्यता हर कदम सामिप्य हो तेरा जहां भी मैं रहूं वाकपटुता से रहे वाणी में मेरी पूर्णता  धर्म हो आचरण हो अज्ञानता का नाश हो कर कृपा की दृष्टि अपनी सरल सा ब्यवहार कर दो मधुर मोहक,,,,,,,,, आलोक रंजन इंदौरवी

बड़ी बहनें

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बड़ी बहनें कभी बड़ा होने नहीं देतीं ये बहनें बड़ी सुख दुःख में जीवन के हरदम रहती खड़ी जीवन के कुछ साल  बस साथ में बिताती हैं बड़ी बहन छोटी से जल्दी अपने ससुराल चली जाती है पर दूर से बाँध कर रखती सदा छोटी से डोर दोनों बहनें पकड़ कर रखती इस डोर के ओर छोर जब भी मिलती लगा देतीं स्नेह की झड़ी कभी बड़ा होने नहीं देतीं ये बहनें बड़ी कभी सखी से ये बनती कभी हैं माँ ये बन जातीं सुख में चाहे न आयें पर दुःख में हरदम ये आतीं छोटी कितनी भी बड़ी हो इनके लिए छोटी ही रहती इनकी लाड़ दुलार डाँट में वात्सल्य की धारा बहती संघर्षों में भी इनका सम्बल देता मुस्कानों की झड़ी कभी बड़ा होने नहीं देतीं ये बहनें बड़ी तृप्ति मिश्रा (कवियत्री तृप्ति मिश्रा अपनी बहन कवियत्री अर्पणा जोशी के साथ)

क्यूं न इक बार

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क्यू न इक बार, खुद को मैं प्यार कर लूं। इठलाती हुई जिंदगी, तुझसे मै आँखे चार कर लूं।। आसमां छूके आने का, स्वप्न था कभी। क्यू न एक बार फिर, वो पंख तैयार कर लूं।  कुछ गुजर तो गई कुछ गुजर जाएगी। क्यू न इक बार फिर, सोलह सिंगार कर लूं।। वो पल किसके थे, कहीं से चुरा लाई मै। क्यू न एक बार फिर से, उम्मीदों का बाजार कर लूं।। वो जो रूठे हैं उनसे, मैं रूठ जाऊंगी। क्यू न अपने भी, नखरे हजार कर लूं।। उनके ख्वाबो की 'कविता',  फिर बन जाउंगी। क्यू न इक बार फिर, रस की फुहार कर लूं।। *कविता सक्सेना*शुजालपुर मध्यप्रदेश

नारी सम्मान में

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नारी माॅं है वो जननी है,  बेटी बहन भगिनी है। वो एक रिश्तों की डोर है, नारी नहीं कमजोर है नारी  सबसे प्यारी है महकाती घर फुलवारी है। देवो की वो जन्मदात्री।  हां वो एक  नारी है। तभी तो जग में प्यारी है। बच्चों को वो जानती है। प्रसव वेदना सहती है। सब बच्चों को सुला सुला  ख़ुद रात रात भर जगती है। सुबह उठे से देर रात तक सारे फ़र्ज़ निभाती है। उसकी बड़ी जिम्मेदारी है। वो एक नारी है। जग में सबसे प्यारी है। अपने दर्द का ज़िक्र ना करती कोल्हू बैल सा खटती रहती भूल के सारी व्यथा हृदय की बस हॅंसती ही रहती है। जिम्मेदारी खूब निभाती, तब नारी कहलाती है। देख रेख़ करना बच्चों की सॅंस्कार भरना बच्चों में भूल के अपने सब सपनों को  बच्चों को सबल बनाती है। तब नारी कहलाती है। आओ  इसका मान बढ़ाएं नारी का सम्मान बढ़ाएं। नहीं करें अपमान कभी हम नारी का अवसान कभी हम सुसंस्कृत  हो परिवार हमारा बच्चों को सभ्य बनाने खातिर सुंदर कृतत्व निभाती है।। तब नारी कहलाती है। शक्ति का स्वरूप है नारी। पुरुषों पर भी पड़ती भारी निज अस्तित्व की रक्षा में वो  बन जाती तलवार दुधारी भ्रूण हत...

राम नाम शिला धरी मंदिर बना रघुनाथ का

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                               आओ राम, राम तुम आओ हृदय के द्वार ये धागा जोड़ दूँ, श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ। ये जो जीवन रेत सा मैं सम्भाले जा रही, रिश्तों को मासूमियत से मैं पाले जा रही, तुम इशारा दो तो पिंजर देह का मैं छोड़ दूँ। राम तुम आओ हृदय के। कितने ही मारीच म्रग बन खड़े हुंकारते, कितने साधु भेष में रावण नज़र से ताड़ते, सबक़ सिखलाओ इन्हें तो मन को मैं परवाज़ दूँ। राम तुम आओ हृदय के द्वार ये धागा जोड़ दूँ, श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ। राम तुम आओ हृदय के , माँ सिया का हरण कर रावण ने सठ परिचय दिया, पर बंधा संकल्प से सिय मातु का न परस किया, मैं भी कृत संकल्प होकर आस तुमसे जोड़ दूँ। राम तुम आओ हृदय के । कितनी भिलिनी हैं खड़ीं राहें रहीं निहारती, कितने केवट सरयू तट पर नाव निज संवारते, भावनाओं को संजीवन ,दो तो जीवन बार दूँ। राम तुम आओ हृदय दर ये धागे जोड़ दूँ, श्वाँस जो दरबान है उसका मैं रस्ता मोड़ दूँ। राम तुम आओ हृदय। राम नाम शिला धरीं मंदिर बना रघुनाथ का, एक या द...

ग़ज़ल जिंदगी कितनी है दस्तूरी यहां पर

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ग़ज़ल ज़िंदगी कितनी  है  दस्तूरी  यहाँ  पर मांग लो  जीने  की  मंजूरी  यहाँ  पर फिसला जाए  वक्त हाथों से कि जैसे  ढलती कोई  शाम  सिन्दूरी  यहाँ  पर सारी शय में अक्श दिखता है तुम्हारा  यादें महकी बन के कस्तूरी  यहाँ  पर  राह मिलती राहों से मंजिल नहीं  पर जाने कैसी कैसी  मजबूरी  यहाँ  पर हौसलों  ने   जब  भरी  ऊंची  उड़ानें तो  बनाया  आसमाँ  दूरी यहाँ   पर कब 'शमा' मैं सोची थी बनके है रहना यूँ  शब-ए-हिज्राँ  में  बेनूरी   यहाँ  पर।                 @सविता 'शमा' ग्रेटर नोएडा

ग़ज़ल हो गया आजकल ख़ुद से बेज़ार हूं।

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ग़ज़ल  हो गया आजकल ख़ुद से बेज़ार हूँ ऐसा लगता है कोई गुनहगार हूँ तुझको पाना तो मुमकिन नहीं है मगर तेरी चाहत में अब भी गिरफ्तार हूँ पूछते हैं सभी मुझसे सब की ख़बर दौरे हाज़िर का लगता है अख़बार हूँ फ़ासले रख के मुझसे मिला कीजिए चलती फिरती मोहब्बत की तलवार हूँ तू ज़मीं-ए-हक़ीक़त पे मिल तो सही दीद का तेरी कब से तलब गार हूँ अपनी तन्हाइयों का हूँ लेता मज़ा वो समझने लगे हैं कि बीमार हूँ अपने लब से सरस गुनगुना ले मुझे अनकहा बज़्म का तेरी अश्आर हूँ ------सुशील तिवारी 'सरस'

गीत जीना होगा मरना होगा

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जग के इस अनसुलझे पथ पर  सोच समझकर चलना होगा रोना होगा गाना होगा  जीना होगा मरना होगा  जो भी अब अभिव्यक्ति होगी झूठी बनकर उलझायेगी लेकिन दुनिया की दृष्टी में जानें क्या क्या कहलायेगी अविरल जीवन रुक न सकेगा हमको संग भी चलना होगा जग के,,,,,,,,,, मृण्मय तन का ताना बाना मिट्टी में मिल जायेगा सोचो किस पुरुषार्थ के फल पर नव पल्लव फिर आयेगा निष्ठा गहरी जिसमें होगी उस खाई में उतरना होगा जग के,,,,,,, निद्रा आलस के बस होकर लक्ष्य कभी धूमिल हो जाये जन्मों जन्मों की स्मृतियां विस्तृत होकर आज जगाते अब तक कितने  बदल गये हम कितना और बदलना होगा जग के,,,,,,,, अभिलाषायें कुंठित करती पावन मन के आंगन को मार सके हम क्या इस तन में बैठे अपनें रावन को स्वतः नहीं परिलक्षित होगा खुद भी इसमें जलना होगा जग के,,,,,,, आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल जो जुल्मों सितम की वकालत करेंगे

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जो जुल्मों सितम की वकालत करेंगे वो कैसे यहां फिर मुहब्बत करेंगे करें अगर लौट आया जो बचपन हमारा तो फिर से वही हम शरारत करेंगे ज़माने की नज़रों से बचना है मुश्किल नहीं हर तरफ हम शिकायत करेंगे वो गैरों से करते हैं रिश्तों की बातें कहां हमपे इतनी इनायत करेंगे कसम तोड़ सकते नहीं जिंदगी भर वतन की हमेशा हिफाज़त करेंगे आलोक रंजन इंदौरवी

ग़ज़ल ज़रा सी बात पर ही लोग क्यूं कर रूठ जाते हैं।

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ज़रा सी बात पर ही लोग क्योंकर रूठ जाते हैं। बहुत मजबूत दिल रखते हैं फिर भी टूट जाते हैं। किसी को ज़िन्दगी मौक़े कभी ज़्यादा नहीं देती समय की तेज़ आंधी में भी रिश्ते छूट जाते हैं। किसी को देख लें हंसते हुए तो लोग शातिर कुछ लुटेरों की तरह ख़ुशियों को अक्सर लूट जाते हैं। कोई ये मान बैठा था कभी हम खिल न पाएंगे। मगर हम बीज हैं जो बंजरों  में फूट जाते हैं।। - शैलजा सिंह

मन हरण घनाक्षरी

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नमन उड़ान मनहरण- घनाक्षरी पवन सुरभि उड़े मदमाती रस पगी, मदिर मदिर  यह जादू  करे मोहती। सर -सर  करे पात  करे फूल से ये बात, मगन भँवरे सुने तितली है सोहती। बाली हँसी गेहूँ भरी शाक पात सज रहे, सरसों फूलती लगे पिया बाट  जोहती। झूम रही है वल्लरी बौर सजी अमराई, कूक -कूक कोयलिया नई ऋतु टोहती । स्वरचित विभा भटोरे

ग़ज़ल रिवायत के क़फ़स में फॅंस के लड़की फड़फड़ाती है।

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रिवायत के कफ़स में फँस के लड़की फड़फड़ाती है कि जैसे बाज़ के चंगुल में मछली फड़फड़ाती है  हवेली की रिवायत हू-ब-हू बंगले में आ पँहुची यहाँ दासी मचलती है तो रानी फड़फड़ाती है  कोई जीने नहीं देता कोई मरने नहीं देता  हज़ारों साल से यूँ ही ये दिल्ली फड़फड़ाती है  हवा को दोष देने का पुराना है चलन, लेकिन  पनीले तेल से भी जलती बत्ती फड़फड़ाती है  किया करती है मकड़ी शान से जिस पर चहलक़दमी उसी जाले में 'साहिल' फँस के मक्खी फड़फड़ाती है

कविता

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खास आपके लिए.... "तनख्वाह" तनख्वाह या कहूँ ढेरों सपनें। सही तो है, तनख्वाह का दूसरा नाम  सपने ही तो हैं। घर का राशन,दूध का बिल बच्चे की फीस,परिवार की दवा, सब,सब तो पूरा करती है  एक तुम्हारी तनख्वाह। ऑफिस में, दिन भर की मेहनत, दिमाग का ढेरों खर्च , और ठंडा खाना। आसान है क्या एक तारीख और अच्छी लगती तनख्वाह। बच्चे की जेब खर्ची,नए जूते, नए कपड़े और, और  खूबसूरत पौशाकों में तुम्हें सुंदर लगती मैं। सब तुम्हारी मेहनत से ही तो है। रसोई में राशन से भरे डिब्बे घर को अपना बनाने की किश्तें। हर तीस तारीख़ को  फिर से नए सपने,नई खुशी नई जिम्मेदारी,नई उम्मीद सब सम्भालती है वो प्यार से लाई तुम्हारी तनख्वाह। मेरा अन्नपूर्णा कहलाना  सिर्फ तुम्हारी ही बदौलत है। भरी पूरी रसोई ही तो बनाती है  एक स्त्री को अन्नपूर्णा। एक अलग सा प्यार, अलग सा पूर्ण एहसास होता है तुम्हारे सिर्फ इतना कहने से "लो घर खर्च" और मुझे पूर्ण और धनवान करते है , तुम्हारे कहे ये मीठे से शब्द "सब तुम्हारा ही तो है" "मैं" और ये "तनख्वाह" माधुरी"मुस्कान"शर्मा

छंदमुक्त कविता

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जय माँ शारदे शीर्षक -(#सहारा ) विधा: मुक्त छन्द कविता दिनांक: 03/05/22 सहारा ****** काश  डूबते को कोई #सहारा दे देता ।  नैया पार हो जाती किनारा मिल जाता । कहीं तूफानों में घिर कर जीवन - दीप न बुझ जाए । इस तम के अंधकार में कोई सहारा मिल जाता । मन बुझ न जाए दुनिया के इन तीक्ष्ण बाणों से ।  कोई वायदों को निभा बाणों से बचाने वाला मिल जाता ।  कहीं चाहत के फूल मुरझा न जाए अपनों के बुरे इरादों से ।   मन जब उलझा हो तो अपनों का सहारा मिल जाता । हाथ बढ़ा कर देते जो साथ कष्टों से बाहर निकाले ।  वही हमदर्द जीवन में होता तो सहारा मिल जाता ।।                     डॉ रश्मि "रत्न"                स्वरचित मौलिक रचना

गीत

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नारी ------------------------------------------ ईश्वर की श्रेष्ठ कृति अनमोल वरदान हूँ  नूतन सृजन की अमूल्य अवदान हूँ । सब कहते मैं हूँ एक अबला बेचारी, पर आज मैं नहीं अबला हूँ सबला नारी। हाँ ये सच है मैं नारी हूँ मैं नारी हूँ, मैं इस जीवन में कभी नहीं हारी हूँ। फूल जैसी कोमल मन सुंदर नारी हूँ, वक्त आने पर काँटों सी कठोर मैं हूँ। अपनों की खातिर हर खुशी कुर्बान की , फिर भी लोगों ने कहा क्या तेरा है अस्तित्व । हाँ ये सच है मैं नारी हूँ मैं नारी हूँ , मैं इस जीवन में कभी नही हारी हूँ। अपनो ने ही तोड़ा और बिखेर दिया , आँसुओं के समंदर में डुबो दिया।फिर भी मैंने जीवन में हार न मानी, कुछ नया करने की मन में फिर ठानी। नए हौंसले नए सपनों ने ली उड़ान, आज मैंने खुद बनाई अपनी पहचान। समाज में नारी शिक्षा की जोत जगाई, हर नारी को जीवन की नई राह दिखाई। साबित्री मिश्रा झारसुगुड़ा,ओडिशा

गीत

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गीत जब- जब याद तुम्हारी आई। आँखों ने तब नींद गंँवाई। नागिन - सी डसती तनहाई। आग उगलती धवल जुन्हाई। बिस्तर चुभन शूल सी देता, सन्नाटों में रात बिताई। नयनों में बदली सी छाई। जब - जब याद तुम्हारी आई। कभी चुराई हँसी पराई। जाने क्या-क्या विधि अपनाई। चैन कहाँ पलभर को मिलता, जबसे अपनी फटी बिबाई। पोर पोर में पीर समाई। जब जब याद तुम्हारी आई। भरी भीड़ में निपट अकेले। रास नहीं आते अब मेले। बिना तुम्हारे जग सूना सा, काम न आते पाई - धेले। सूरत नहीं गयी बिसराई। जब जब याद तुम्हारी आई।             ● बलराम सरस,एटा उ.प्र.

ग़ज़ल

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रिश्तों को ढोते रहना बेमानी है प्यार बिना तो हर रिश्ता बेमानी है जो नन्हे पौधे हैं उन की फ़िक्र करो ठूंठों को पानी देना बेमानी है अपने ही जब अपनों जैसे नहीं रहे गैरों को अपना कहना बेमानी है सहरा में ख़ुश्बू को ढूंढने वाले सुन तेरे बारे कुछ कहना बेमानी है क्यों औरों की फ़िक्र में ख़ुद को गला रहा ख़ुद को ही धोखा देना बेमानी है दस्तानों से हाथ मिला कर क्या हासिल झूठा है ये याराना बेमानी है अजय अज्ञात फरीदाबाद हरियाणा कवि एवं शायर

ग़ज़ल बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा

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बंद थी आंखें मगर ये अश्क तो बहता रहा बेबसी के गांव में मैं किस तरह रहता रहा भागता कैसे मैं रिश्तो के बड़े बाजार से मैं घुटन महसूस करता और वो हंसता रहा मुद्दतें गुजरी रवानी वक्त की बदली नहीं फैसला कुछ कर न पाया आजकल करता रहा कोई अपनों में नहीं था जो मुझे कुछ दाद दे ख्वाब का रंगीं महल यूं रात दिन ढहता रहा कितनी जंजीर है तो मैंने तोड़ कर दिखला दिया कुछ मगर ऐसी थी जिनमें उम्र भर फंसता रहा कौन सी वो सै है जिसमें जिंदगी हंसती रहे उसी को देखने को हर जगह रुकता रहा आईना बतला न पाया मेरी खामोशी का राज़ मैं उसी के सामने ही रास्ता चलता रहा आलोक रंजन इंदौरवी